|| यीशु ने कहा, "देखो, मैं शीघ्र आनेवाला हूँ। मेरा पुरस्कार मेरे पास है और मैं प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्मों का प्रतिफल दूँगा। मैं अल्फा और ओमेगा; प्रथम और अन्तिम; आदि और अन्त हूँ।" Revelation 22:12-13     
Home

My Profile

Topics

Words Meaning

Promises of God

Images

Songs

Videos

Feed Back

Contact Us

Visitor Statistics
» 1 Online
» 3 Today
» 25 Yesterday
» 63 Week
» 112 Month
» 1907 Year
» 44132 Total
Record: 15396 (02.03.2019)

सात धर्मसेवकों की नियुक्ति


 

                                                                प्रेरितों के काम 6:1-7-

[1] उन दिनों में जब चेले बहुत होते जाते थे, तो यूनानी भाषा बोलने वाले इब्रानियों पर कुड़कुड़ाने लगे, कि प्रति दिन की सेवकाई में हमारी विधवाओं की सुधि नहीं ली जाती

[2] तब उन बारहों ने चेलों की मण्डली को अपने पास बुलाकर कहा, यह ठीक नहीं कि हम परमेश्वर का वचन छोड़कर खिलाने पिलाने की सेवा में रहें।

[3] इसलिये हे भाइयो, अपने में से सात सुनाम पुरूषों को जो पवित्र आत्मा और बुद्धि से परिपूर्ण हों, चुन लो, कि हम उन्हें इस काम पर ठहरा दें।

[4]परन्तु हम तो प्रार्थना में और वचन की सेवा में लगे रहेंगे।

[5]यह बात सारी मण्डली को अच्छी लगी, और उन्होंने स्तिुफनुस नाम एक पुरूष को जो विश्वास और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण था, और फिलेप्पुस और प्रखुरूस और नीकानोर और तीमोन और परिमनास और अन्ताकियावासी नीकुलाउस को जो यहूदी मत में आ गया था, चुन लिया।

[6]और इन्हें प्रेरितों के साम्हने खड़ा किया और उन्होंने प्रार्थना करके उन पर हाथ रखे

[7]और परमेश्वर का वचन फैलता गया और यरूशलेम में चेलों की गिनती बहुत बढ़ती गई; और याजकों का एक बड़ा समाज इस मत के अधीन हो गया।

                                                Acts 6:1-7 -The Choosing of the Seven

1. In those days when the number of disciples was increasing, the Grecian Jews among them complained against the Hebraic Jews because their widows were being overlooked in the daily distribution of food.

2. So the Twelve gathered all the disciples together and said, “It would not be right for us to neglect the ministry of the word of God in order to wait on tables.

3. Brothers, choose seven men from among you who are known to be full of the Spirit and wisdom. We will turn this responsibility over to them

4. and will give our attention to prayer and the ministry of the word.”

5. This proposal pleased the whole group. They chose Stephen, a man full of faith and of the Holy Spirit; also Philip, Procorus, Nicanor, Timon, Parmenas, and Nicolas from Antioch, a convert to Judaism.

6. They presented these men to the apostles, who prayed and laid their hands on them.

7. So the word of God spread. The number of disciples in Jerusalem increased rapidly, and a large number of priests became obedient to the faith.

-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                    वचन की पृष्ठभूमि 

इब्रानी-भाषी [Hebrew]

-इब्रानी (हिब्रू) शामी-हामी भाषा-परिवार की शामी शाखा में आने वाली एक भाषा है। ये इस्राइल की मुख्य और राष्ट्रभाषा है। इसका पुरातन रूप तौराती इब्रानी यहूदी धर्म की धर्मभाषा है और बाइबल का पुराना नियम “तौरात” में लिखा गया था। ये इब्रानी लिपि में लिखी जाती है ये दायें से बायें पढ़ी और लिखी जाती है।

इब्री, इब्रानियों, इब्रानी [Hebrew] –

यह नाम “इब्री” ऐबेर से बना है जो नूह का पुत्र और शेम का वंशज था। इसका अर्थ यह है कि इब्रानी लोग “शामी” लोग थे।“शामी” का अर्थ है शेम का वंशज (उत्प.10:21,25)। इब्राहीम एक इब्रानी व्यक्ति था क्योंकि वह शेम का और ऐबेर का वंशज था (उत्प.11:10-26,14:13)। अतः इब्राहीम के वंशज भी इब्री थे (उत्प.39:17,40:15,43:32)।

कालान्तर में यह नाम इब्रानी केवल उन लोगों के लिए सीमित रूप से प्रयोग में लाया जाने लगा जो इब्राहीम के वंशज इसहाक और याकूब के वंशज थे। दूसरे शब्दों में इब्री नाम इस्राएलियों का दूसरा नाम था (निर्ग.1:15; 2:6,11; 3:18; 5:3;21:2; 1शमू.4:6; 13:19; 14:11; 29:3; यिर्म.34:9; योना1:9; प्रेरि.6:1; 2कुरि.11:22; फिलिम.3:5)। एक तीसरा नाम जो बाद में इनके लिए प्रयोग में लाया जाने लगा वह था यहूदी और आज यह नाम साधारणतः प्रयोग में लाया जाता है (यिर्म.34:9; यूह.1:19; प्रेरि.2:5; रोमि.11:10)।

यूनानी-भाषी [Greek] -

यूनान के लोग को यूनानी अथवा यवन कहलाते हैं। यूनान यूरोप महाद्वीप में स्थित देश है। जैसे:- तुर्की, मिस्र, पश्चिमी यूरोप इत्यादि।

मसीही युग के पहले यूनानी की शक्ति का बड़ी शीघ्रता और प्रबलता के साथ विकास हुआ। सिकन्दर महान् ने ई.पू.336 में मैसोडोनिया पर अधिकार करके फारस के राज्य को समाप्त कर दिया और कुछ वर्षों में अपना राज्य भारत की सीमा तक बढ़ा दिया (दानि.8:5-7; 20:21,11:2-3)।

यूनानी लोग जहां भी गए उन्होंने वहां अपना सांस्कृतिक प्रभाव जमा लिया। साम्राज्य में यूनानी भाषा आम भाषा बन गई। यूनानी वस्तु कला सुन्दर नगरों के भवनों में दिखाई देने लगी और यूनानी विचारकों के विचार से लोगों की विचारधारा में सब स्थानों पर दृष्टिकोणों में परिवर्तन हो गया (1कुरि.1:20-22)। यूनानियों ने अपनी प्रजा के स्तर में विकास किया और उनके लिए शिक्षा, मनोरंजन,खेल-कूद तथा सामाजिक कल्याण आदि का ऐसा प्रबन्ध किया जिसे उनकी प्रजा पहले नहीं जानती थी। जो लोग यूनानी सभ्यता को स्वीकार कर लेते थे वे शिक्षित और अन्य लोग असभ्य समझे जाते थे (रोमि.1:1-4)।

यूनानी-भाषी भी यहूदी थे। इन्होंने यूनानी सभ्यता तथा भाषा अपनायी थी।

जब सिकन्दर महान (ई.पू.356-323) ने प्राचीन पश्चिमी एशिया को जीत लिया था,तब प्राचीन संसार में यूनानी भाषा और संस्कृति फैलने लगी।एक तरह से यूनानी विश्वव्यापी भाषा बन गई। पढ़े-लिखे लोग अपनी स्थानीय भाषा के साथ-साथ यूनानी भाषा भी समझते थे।

अरामी भाषा जो पलस्तीन और सीरिया (आराम) के अधिकांश भागों में बोली जाती थी,यह भाषा इब्रानी के समान थी और अधिकांश यहूदियों द्वारा प्रतिदिन एक के कार्यों में प्रयोग की जाती थी।

यूनानी यहूदी अरामी नहीं बोल सकते थे जो कि इस्राएल के यहूदियों की मातृ-भाषा थी। सम्भवतः वे देश के बाहर पले-बढ़े थे और द्विभाषी थे, यूनानी और उनकी मातृ भाषाएं दोनों बोलते थे (प्रेरि.2:5-11)। सम्भवतः यहूदी धर्म में परिवर्तित अन्यजाति जो कि बाद में मसीही बनें, वे भी इस समूह में थे। स्वदेशी यहूदी भी द्विभाषी थे क्योंकि वे अरामी और यूनानी बोलते थे (प्रेरि.21:40)। यहूदी जगत में यूनानी यहूदियों और अरामी बोलने वाले यहूदियों में तनाव थे,यह बड़ी दु:खद बात थी कि ये तनाव कलीसिया में लाए गए।  

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

                                                                  वचन का व्याख्यान

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

6:1- उन दिनों में जब चेले बहुत होते जाते थे, तो यूनानी भाषा बोलने वाले इब्रानियों पर कुड़कुड़ाने लगे, कि प्रति दिन की सेवकाई में हमारी विधवाओं की सुधि नहीं ली जाती।

यह वचन आरम्भिक कलीसिया अर्थात् पेन्तेकुस्त पर्व के बाद की समय का एक इतिहास है। उस समय विश्वासी सामाजिक एकता का जीवन जी रहे थे, परन्तु यह कुछ समय तक ही सफल रहा, अब सांसारिकता कलीसिया में प्रवेश कर गयी थी। जैसा कि हम प्रेरितों के काम अध्याय 5:1-11 में देखते हैं कि हनन्याह और सफीरा ने अपनी सम्पत्ति को बेचा और उन्होंने उस सम्पत्ति के दाम में से एक हिस्से को अपने पास रख लिया तथा एक हिस्सा लाकर प्रेरितों के पांवों के आगे रख दिया। हनन्याह और सफीरा का पाप इसमें नहीं था कि उन्होंने उनकी सारी सम्पत्ति को नहीं बेचा,या इसमें कि उन्होंने सम्पत्ति के एक हिस्से को रख लिया, परन्तु इस विषय के संबंध में उनके झूठ बोलने से था कि इस सम्पत्ति के लिए उन्हें कितना मूल्य प्राप्त हुआ है। आत्मा से झूठ बोलना परमेश्वर से झूठ बोलना है, क्योंकि पवित्र आत्मा परमेश्वर है।  

यहां हम देखते हैं कि यूनानी भाषी इब्रानी विश्वासियों पर कुड़कुड़ा रहे थे। यह विवाद उनका कोई जातिवाद नहीं था और न ही वे यहूदी विरोधी थे। यहां यूनानियों से अर्थ है कि यूनानी भाषी  यहूदी, जो अल्पसंख्यक भी थे। वे यूनानी भाषी के साथ मिल-घुल गये थे। जबकि यरूशलेम (फिलिस्तीन देश की राजधानी—इब्री) के यहूदी मूसा की व्यवस्था का पालन करते थे, तो स्वाभाविक है कि उनमें मतभेद होना अवश्य था। प्रिय भाईयों एवं बहिनों उस समय के आंकड़ों के आधार पर कलीसिया की सदस्यता लगभग 25000 थी। इस प्रकार हम देखते हैं कि आरम्भिक कलीसिया भी सिद्ध नहीं थी। प्रारम्भिक कलीसिया निःसंदेह सामर्थी थी, परन्तु वहां पर भी समस्या थी। पवित्र आत्मा कलीसिया को जिस आत्मिक ऊंचाई पर ले आया था, उसमें शैतानी विभाजन और अव्यवस्था से अवरोध उत्पन्न हुआ। भौतिक वस्तुओं में साझे का जीवन जो पहले कलीसिया का गुण था, उसी के कारण पुराने स्वभाव के स्वार्थपरता का मार्ग था। उनमें सांसारिकता प्रवेश कर चुकी थी। यूनानी यहूदी जो अल्पसंख्यक थे। अपने आप को वंचित समझने लगे और उन्होंने यह मुद्दा उठाया कि उनके विधवाओं को इब्रानी विधवाओं के सेवा के समान बराबर सेवा की जानी चाहिए अर्थात् यह समाजवाद की जीवन शैली उनकी इच्छा के अनुरूप नहीं हो रही थी और यह विषय प्रेरितों के दृष्टि में लाया गया।

✓ ये यूनानी इस्राएल से बाहर बसे यहूदी समुदाय के यूनानी भाषी मसीही थे तथा इब्रानी अरामी भाषी यहूदी मसीही थे।

-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

6:2- तब उन बारहों ने चेलों की मण्डली को अपने पास बुलाकर कहा, यह ठीक नहीं कि हम परमेश्वर का वचन छोड़कर खिलाने पिलाने की सेवा में रहें।

यीशु के बारह शिष्यों में से यहूदा इस्करियोती का रिक्त पद को भरना -

I. बारह प्रेरितों

यीशु ने बारह शिष्यों को अपने मिशन कार्य के लिए चुना था। चूंकि यहूदा इस्करियोती बारहों शिष्यों में से एक था, उसने 30 चान्दी के सिक्कों के लालच में पड़कर प्रभु यीशु मसीह को नमस्कार (अभिवंदन) किया और अपना चुम्बन देकर महायाजकों और पुरनियों के हाथों पकड़वा दिया (मत्ती 26:47-50) । जब यहूदा इस्करियोती ने देखा कि यीशु दोषी ठहराया गया है तो वह पछताया और वे 30 चान्दी के सिक्कों को महायाजकों और पुरनियों के पास फेर लाया और उन सिक्कों को मंदिर में फेंक दिया और अपने आपको फांसी दे दिया (मत्ती 27:3-5)। 12 प्रेरितों में से एक यहूदा इस्करियोती का रिक्त स्थान को भरने के लिए एक युसूफ को जो बर-सबा कहलाता है जिसका उपनाम यूसतुस है और दूसरा मत्तियाह के नाम में चिट्ठियां डाली गई और चिट्ठी मत्तियाह के नाम पर निकली । इस प्रकार  मत्तियाह 11 प्रेरितों के साथ गिना गया (प्रेरितों 1:23-26)  अर्थात् 12 प्रेरितों में मत्तियाह को सेवकाई और प्रेरिताई के कार्य के लिए सम्मिलित किया गया।

II. परमेश्वर का वचन

1.परमेश्वर का वचन बाइबल है-

जिसमें 66 पुस्तकें हैं, जिसे लगभग 40 लेखकों ने अलग अलग स्थानों में और अलग अलग समयों में लिखा। बाइबल में कुल 1189 अध्याय और 31101 पद हैं पुराने नियम में शब्द परमेश्वर 3382 बार उपयोग किया गया है।

2.परमेश्वर का वचन तलवार है -

आत्मा की तलवार जो परमेश्वर का वचन है,

इफिसियों 6:17 - और उद्धार का टोप, और आत्मा की तलवार जो परमेश्वर का वचन है, ले लो।

इब्रानियों 4:12 - क्योंकि परमेश्वर का वचन जीवित, और प्रबल, और हर एक दोधारी तलवार से भी बहुत चोखा है, और जीव, और आत्मा को, और गांठ गांठ, और गूदे गूदे को अलग करके, वार पार छेदता है; और मन की भावनाओं और विचारों को जांचता है।

तलवार एक ऐसा हथियार है जो वार करता है। यह आत्मिक रूप से अंधकार की शक्तियों के लिए इसकी उपमा दी गई है, क्योंकि हमारे हथियार आत्मिक गढ़ों को ढा देने के लिए पर्याप्त हैं।

3.परमेश्वर का वचन हथोड़े के समान है [The Word of God is powerful]---

परमेश्वर का वचन हथोड़े के समान है क्योंकि परमेश्वर का वचन बड़ा ही सामर्थी है। जिसकी उपमा एक हथोड़े से भी की गई है।

यिर्मयाह 23:29 - यहोवा की यह भी वाणी है कि क्या मेरा वचन आग सा नहीं है? फिर क्या वह ऐसा हथौड़ा नहीं जो पत्थर को फोड़ डाले?

यिर्मयाह 23:29 में कहता है कि परमेश्वर का वचन ऐसे हथोड़े के समान जो किसी भी चट्टान को चूर चूर करने की शक्ति रखता है। अर्थात् यह गलत शिक्षाओं के ऊपर एक भारी प्रहार करता है और शैतान की शक्तियों के टुकड़े टुकड़े कर सकता है।

4.परमेश्वर का वचन दीपक के समान है [The word of God is like lamp] ---

परमेश्वर का वचन दीपक के समान है। भजनों को लिखने वाला भजनकार राजा दाउद कहते हैं, तेरा वचन मेरे पांव के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है (भजन 119:105)। परमेश्वर का वचन घोर अंधकार में भी हमारे लिए आत्मिक उजियाला लेकर आता है, ताकि हम सत्य रूपी उजियाला में चल सकें। प्रभु यीशु ने कहा, जगत की ज्योति मैं हूं; जो मेरे पीछे हो लेगा, वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा [यूहन्ना 8:12]

5.परमेश्वर का वचन दूध के समान है--

जब एक व्यक्ति प्रभु में आता है और प्रभु यीशु पर विश्वास करता है वह कितना भी उम्र का क्यों न हो वह एक नए जन्मे बालक की तरह होता है और उसे बढ़ने के लिए दूध की आवश्यकता होती है.

1 पतरस 2:2 - नये जन्मे हुए बच्चों की नाईं निर्मल आत्मिक दूध की लालसा करो, ताकि उसके द्वारा उद्धार पाने के लिये बढ़ते जाओ।

इब्रानियों 5:13 - क्योंकि दूध पीने वाले बच्चे को तो धर्म के वचन की पहिचान नहीं होती, क्योंकि वह बालक है।

हर एक व्यक्ति जो प्रभु में नया जन्म पाया हुआ है उसे दूध की जरूरत है ताकि वह आत्मा में और सत्य में बढ़ सके और धार्मिकता में बढ़ सके।

6.परमेश्वर का वचन पुराना नियम भी है  [The God’s Word is also the Old Testament] ---

हाँ, पुराना नियम भी परमेश्वर का वचन है। बाइबल कहती है सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है प्रभु यीशु ने कहा मैं व्यवस्था की शिक्षाओं को लोप करने नहीं बल्कि उन्हें पूरा करने आया हूँ प्रभु यीशु ने नए नियम में पुराने नियम की 29 किताबों में से उल्लेख किया है जो बताता है पुराना नियम भी परमेश्वर का वचन है।

7.परमेश्वर का वचन रोटी के समान है --

जीवन जीने के लिए रोटी अति आवश्यक भोजन वस्तु है जो हमारे शरीर को पोषकतत्व प्रदान करती है और हमें हृष्ट पुष्ट रखती है। लेकिन प्रभु यीशु ने कहा मनुष्य केवल रोटी से ही नहीं, बल्कि हर एक वचन जो परमेश्वर के मुख से निकलता है अर्थात् परमेश्वर के वचन से जीवित रहेगा (मत्ती 4:4)।

ये बात प्रभु यीशु ने पुराने नियम के व्यवस्था विवरण के 8:3 से कही थी. व्यवस्थाविवरण 8:3 - उसने तुझ को नम्र बनाया, और भूखा भी होने दिया, फिर वह मन्ना, जिसे न तू और न तेरे पुरखा ही जानते थे, वही तुझ को खिलाया; इसलिये कि वह तुझ को सिखाए कि मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं जीवित रहता, परन्तु जो जो वचन यहोवा के मुंह से निकलते हैं उन ही से वह जीवित रहता है।

और व्याख्या की थी प्रभु यीशु ही जीवन की रोटी हैं जो इस धरती पर बहुतायत का जीवन देने को आये यूहन्ना 10:10 - चोर किसी और काम के लिये नहीं परन्तु केवल चोरी करने और घात करने और नष्ट करने को आता है। मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएं, और बहुतायत से पाएं।

खिलाने-पिलाने की सेवा-

कलीसिया में व्यावहारिक विषय से निपटने के लिए डीकन के पद को विकसित किया गया था। शब्द “खिलाने-पिलाने” का अनुवाद यूनानी शब्द डायकोनीन से किया गया है, जिसका अर्थ है “परिचर, वेटर, या जो दूसरे की सेवा करता है”। डीकनों का पहला समूह यरूशलेम की कलीसिया में सात पुरुषों का था, जिन्हें प्रतिदिन भोजन वितरण के काम को करने के लिए नियुक्त किया गया था। इसलिए, एक डीकन वह होता है, जो कलीसिया में आधिकारिक क्षमता के साथ दूसरों की सेवा करता है।

सेवा के लिये प्रयुक्त यूनानी शब्द वही है जिससे डीकन [Deacon] शब्द की उत्पत्ति हुई, परन्तु ये सभी सेवक के अर्थ में ही डीकन [Deacon] थे।

- 1तीमुथियुस 3:8 - वैसे ही सेवकों को भी गम्भीर होना चाहिए, दो रंगी, पियक्कड़, और नीच कमाई के लोभी न हों।

✓वे विधवाओं को भोजन वितरण के प्रबन्धकर्ता थे, और उनके लिए धनराशि का प्रबन्ध करते थे, क्योंकि “खिलाने-पिलाने” के लिए आए यूनानी शब्द का अर्थ -  अर्थव्यवस्था का प्रबंधन से है।

✓प्रेरितों ने यह उचित नहीं समझा कि परमेश्वर के वचन छोड़कर खिलाने -पिलाने लगा रहे, उन्होंने परमेश्वर के वचन के अध्ययन में रहना अधिक उचित समझा। यदि वे वचन की अपेक्षा खिलाने-खिलाने में लग जाते हैं तो वह विनाश का कारण होता है। उनके लिए वचन और प्रार्थना अधिक आवश्यक था। प्रिय भाईयों एवं बहिनों, प्रत्येक कलीसिया को यह समझना आवश्यक है कि बिशप/पादरी/पासवान के लिए वचन का मनन और प्रार्थना कैसी महत्वपूर्ण बात है।

-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

6:3- इसलिये हे भाइयो, अपने में से सात सुनाम पुरूषों को जो पवित्र आत्मा और बुद्धि से परिपूर्ण हों, चुन लो, कि हम उन्हें इस काम पर ठहरा दें।

खिलाने-पिलाने की सेवकाई के लिए सात सुनामी पुरूषों की चुनाव हेतु  आवश्यक योग्यताएं हों –

[1]पुरूष, [2]विश्वासी, [3]सुनाम, [4]आत्मिक, और [5] बुध्दिमान।

यूनानी भाषा में जिस काम का वर्णन किया गया है यह वही शब्द है जो सेवकाई के लिए प्रयोग में आया है।

✓इस वचन की समस्या के निधान के लिए 07 पुरूषों का चयन किया क्योंकि वे प्रार्थना और वचन का त्याग करके इस बोझ को उठाना अनुचित समझते थे। अब इन 07 पुरूषों की योग्यता पर ध्यान दीजिए, इन्हें खिलाने -पिलाने की सेवा का उत्तरदायित्व सौंपा जा रहा है। अतः यह स्पष्ट जाहिर है कि सेवा के उत्तरदायित्व को उठाने के लिए अधिक आत्मिकता, बुध्दि और प्रार्थना की आवश्यकता होती है। और सेवकों की योग्यताओं पर संदेह की स्थिति ही उत्पन्न न हों।

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

6:4- परन्तु हम तो प्रार्थना में और वचन की सेवा में लगे रहेंगे।

प्रार्थना और परमेश्वर के वचन की सेवा :-

I. प्रार्थना:-

प्रार्थना, परमेश्वर के साथ बातचीत करने एवं परमेश्वर से मधुर सम्बन्ध जोड़ने का एक विकसित माध्यम है, जो व्यक्तिगत, सामूहिक, मौन रूप में परमेश्वर से मांगने, निवेदन और धन्यवाद करने के माध्यम से होता है।

त्रिएक परमेश्वर ही सब कुछ का स्रोत है। इसलिए हम प्रार्थना में अपनी और अन्य विश्वासियों की आत्मिक उन्नति, पवित्रता में वृध्दि, विश्वास, परिपक्वता आदि में बढ़ने एवं परमेश्वर को और अधिक जानने के लिए प्रार्थना करते हैं ताकि हम परमेश्वर की स्तुति, महिमा, प्रशंसा और धन्यवाद करते हुए उसकी संगति में सदैव बनें रहने पायें।

II. परमेश्वर के वचन की सेवा से आशीषें --

1.परमेश्वर का वचन स्वतंत्र करता है - प्रभु यीशु ने कहा है, तुम सत्य को जानोगे तब तुम स्वतंत्र हो जाओगे.

यूहन्ना 8:32 - और सत्य को जानोगे, और सत्य तुम्हें स्वतंत्र करेगा।

प्रभु ने कहा मैं ही मार्ग सत्य और जीवन हूँ वचन जो देहधारी हुआ वो वचन यीशु मसीह ही है।

यूहन्ना 1:1-3 -

[1]आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था

[2]यही आदि में परमेश्वर के साथ था।

[3]सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उस में से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।

2.परमेश्वर का वचन चंगाई देता है--- परमेश्वर अपने वचन को भेजकर सभी रोगों से हमको चंगा करता है।

भजन संहिता 107:20 - वह अपने वचन के द्वारा उन को चंगा करता और जिस गड़हे में वे पड़े हैं, उससे निकालता है।

प्रभु यीशु ने अपने वचन को भेजकर दूर से कहकर उस सूबेदार के सैनिक को चंगा कर दिया था

3.परमेश्वर का वचन विश्वास उत्पन्न करता है ---

बाइबल कहती है विश्वास जो सारे जगत में जय पाता है वह विश्वास सुनने से आता है और सुनना प्रभु यीशु मसीह के वचन से होता है।

रोमियो 10:17 - सो विश्वास सुनने से, और सुनना मसीह के वचन से होता है।

4.परमेश्वर का वचन पापों से बचाता है---

बाइबल में परमेश्वर के दास दाउद ने इस प्रकार कहा है, एक जवान किस उपाय से अपने आपको शुद्ध और पवित्र रख सकता है, केवल एक ही उपाय से और वह है परमेश्वर के वचन के अनुसार सावधान रहने से।

भजन संहिता 119:9 - जवान अपनी चाल को किस उपाय से शुद्ध रखे? तेरे वचन के अनुसार सावधान रहने से।

5.परमेश्वर का वचन हमें आनन्दित जीवन देता है--- आशीषित है वह व्यक्ति जो परमेश्वर के वचन को सुनता है उस व्यक्ति से परमेश्वर भी प्रसन्न होता है और उसे आनन्दित जीवन की भी प्राप्ति होती है।

नीतिवचन 8:34 - क्या ही धन्य है वह मनुष्य जो मेरी सुनता, वरन मेरी डेवढ़ी पर प्रति दिन खड़ा रहता, और मेरे द्वारों के खंभों के पास दृष्टि लगाए रहता है।

यीशु मसीह ने भी कहा धन्य या आशीषित है वह व्यक्ति जो परमेश्वर के वचन को सुनता और उसे अपने जीवन में लागू भी करता है।

लूका 11:28 - उस ने कहा, हां; परन्तु धन्य वे हैं, जो परमेश्वर का वचन सुनते और मानते हैं।

6.परमेश्वर का वचन मानने से हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर भी मिलता है--- प्रभु यीशु ने कहा यदि मेरी बातें तुम में बनी रहीं और तुम मुझमें बने रहो अर्थात् यदि तुम परमेश्वर के वचन का पालन करो उसे मानो तो जो मागों वो तुम्हारे लिए हो जाएगा।

यूहन्ना 15:7 - यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें तो जो चाहो मांगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा।

7.परमेश्वर का वचन हमें अनंत जीवन का आश्वासन प्रदान करता है---

जीवन में सच्ची ख़ुशी पाने के लिए एक जीवित आशा का होना अति आवश्यक है कि इस जीवन के बाद हमारा क्या होगा…जो हमें केवल परमेश्वर का वचन ही देता है. मैंने तुम्हें जो परमेश्वर के पुत्र के नाम पर अर्थात् यीशु मसीह पर विश्वास करते हो, इसलिए लिखा है कि तुम जानो कि अनंत जीवन तुम्हारा है.

1 यूहन्ना 5:13 - मैं ने तुम्हें, जो परमेश्वर के पुत्र के नाम पर विश्वास करते हो, इसलिये लिखा है; कि तुम जानो, कि अनन्त जीवन तुम्हारा है।

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

6:5- यह बात सारी मण्डली को अच्छी लगी, और उन्होंने स्तिुफनुस नाम एक पुरूष को जो विश्वास और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण था, और फिलेप्पुस और प्रखुरूस और नीकानोर और तीमोन और परिमनास और अन्ताकियावासी नीकुलाउस को जो यहूदी मत में आ गया था, चुन लिया।

स्तिफनुस…..नीकुलाउस-

✓सभी सातों के नाम यूनानी थे, यहूदी नहीं। इनमें से दो, स्तिफनुस और फिलिप्पुस ने शीघ्र ही अपने ओजस्वी सुसमाचार प्रचार के कारण विशिष्ट स्थान बना लिया।

केवल स्तिफनुस और फिलिप्पुस का वर्णन दोबारा आया है। सभी सात पुरूषों के यूनानी नाम थे। सम्भवतः प्रेरितों ने यूनानी भाषा लोगों को नियुक्त किया, क्योंकि यूनानी भाषा बोलने वालों ने ही शिकायत की थी (6:1)। नीकुलाउस एक “धर्मान्तरित” शब्द है इसका अर्थ होता है कि एक गैर-यहूदी जिसने यहूदी धर्म ग्रहण कर लिया था।

अन्ताकिया वासी- अन्ताकिया सीरिया (आराम) का एक युनानी नगर था जो गैर-यहूदियों के बीच मसीही सुसमाचार प्रचार का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था 11:19-30)।

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

6:6- और इन्हें प्रेरितों के साम्हने खड़ा किया और उन्होंने प्रार्थना करके उन पर हाथ रखे।

प्रार्थना करके उन पर हाथ रखे-

- इस प्रकार की अभिव्यक्ति को चंगाई में या आशीष देने में (मर.1:41,10:16), किसी को एक विशेष कार्य के लिये चुनने में (प्रेरित6:6, 1तिमु.5:22), या पवित्र आत्मा प्रदान करने में (प्रेरित.19:6,1तिमु.4:4) किया जाता था (उत्प.48:13:20)।

इन सात सेवकों को खिलाने -पिलाने की सेवा करने नयी जिम्मेदारी के लिए प्रेरितों ने अपने हाथ रखकर आशीष दिए।

*मरकुस 1:41 -उस ने उस पर तरस खाकर हाथ बढ़ाया, और उसे छूकर कहा; मैं चाहता हूं तू शुद्ध हो जा।

*मरकुस 10:16 – और उस ने उन्हें गोद में लिया, और उन पर हाथ रखकर उन्हें आशीष दी॥

*प्रेरितों के काम 6:6 -और इन्हें प्रेरितों के साम्हने खड़ा किया और उन्होंने प्रार्थना करके उन पर हाथ रखे।

*1 तीमुथियुस 5:22 -किसी पर शीघ्र हाथ न रखना और दूसरों के पापों में भागी न होना: अपने आप को पवित्र बनाए रख।

*प्रेरितों के काम 19:6 - और जब पौलुस ने उन पर हाथ रखे, तो उन पर पवित्र आत्मा उतरा, और वे भिन्न भिन्न भाषा बोलने और भविष्यद्ववाणी करने लगे।

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

6:7- और परमेश्वर का वचन फैलता गया और यरूशलेम में चेलों की गिनती बहुत बढ़ती गई; और याजकों का एक बड़ा समाज इस मत के अधीन हो गया।

याजकों का समाज

परमेश्वर ने इस्राएल को संसार से अलग किया और इस्राएल को परमेश्वर ने चुनकर अपनी प्रजा बना लिया था। यह प्रजा याजकों का एक बड़ा समाज अर्थात् पवित्र प्रजा बन गई थी। यद्यपि इस्राएल की धार्मिक विधि में याजकों का एक विशेष नियम था, इसमें समझने की बात यह थी (विशेष रीति से धार्मिक विधि से सम्बन्धित होते हुये) कि परमेश्वर के सब जन याजक थे।  इस्राएल के लोगों को परमेश्वर की आराधना करके और अन्य जातियों में उसका प्रचार करके उसके बारे में लोगों को बतलाने के द्वारा उसकी सेवा करनी थी (निर्ग.19:5-6; यशा.61:6)।

वे शब्द जो निर्ग.19:5-6 में पुराना नियम के परमेश्वर के लोगों के लिए प्रयोग में लाए गए हैं वे ही शब्द ‘नया नियम’ में परमेश्वर के लोगों अर्थात् मसीही कलीसिया के लिए लाए गए हैं। मसीह के लोग परमेश्वर की चुनी हुई कलीसिया प्रजा के लोग हैं अर्थात् वे याजकों का समाज और पवित्र जाति के लोग हैं (1पत.2:9-10; प्रका.1:6; 5:9-10)। वे परमेश्वर की सेवा आराधना और स्तुति के बलिदान चढ़ाकर (1पत.2:5; इब्रा.13:15) और जाति जाति में उसका प्रचार करके, करते हैं (1पत.2:9; रोमि.15:16)।

मसीह में प्रिय भाईयों एवं बहिनों, परमेश्वर का वचन हमें यह प्रेरित करता है कि हम मसीही विश्वासी परमेश्वर के चुने हुए जन हैं, अर्थात् पवित्र प्रजा हैं। इसलिए हम प्रार्थनामय जीवन जीएं, परमेश्वर के वचन को सुनने और मानने वाले बनें और परमेश्वर के वचन का ध्यान व मनन-चिन्तन करें। परमेश्वर का वचन हमें अनन्त जीवन का आश्वासन की ओर आगे बढ़ाये ले चलता है, जिससे कि हम विश्वासी परमेश्वर के स्वर्गीय धाम में प्रवेश पाने के भागीदारी बन सकें।

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

 

 


Disclaimer     ::     Privacy     ::     Login
Copyright © 2019 All Rights Reserved