यीशु का शिष्य बनने कि मूल्य [The Cost of Following Jesus]
[यीशु का शिष्य बनने की शर्तें, सांसारिक मनुष्यों के द्वारा अस्वीकार]
लूका 9:57-62 [मत्ती 8:19-22]
[57]जब वे मार्ग में चले जाते थे, तो किसी ने उससे कहा, “जहां जहां तू जाएगा, मैं तेरे पीछे हो लूंगा।” As they were walking along the road, a man said to him,”I will follow you wherever you go.”
[58]यीशु ने उस से कहा, “लोमडिय़ों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं, पर मनुष्य के पुत्र को सिर धरने की भी जगह नहीं।”
Jesus replied, “Foxes have holes and birds of the air have nests,but the Son of Man has no place to lay his head.
[59]उसने दूसरे से कहा, “मेरे पीछे हो ले।”; उस ने कहा; “हे प्रभु, मुझे पहिले जाने दे कि अपने पिता को गाड़ दूं।”
He said to another man, “Follow me.” But the man replied, “Lord, first let me go and bury my father.”
[60]उसने उससे कहा, “मरे हुओं को अपने मुरदे गाड़ने दे, पर तू जाकर परमेश्वर के राज्य की कथा सुना।”
Jesus said to him, “Let the dead bury their own dead,but you go and proclaim the kingdom of God.”
[61]एक और ने भी कहा; “हे प्रभु, मैं तेरे पीछे हो लूंगा; पर पहिले मुझे जाने दे कि अपने घर के लोगों से विदा हो आऊं।”
Still another said, “l will follow you, Lord; but first let me go back and say goodby to my family.
[62]यीशु ने उस से कहा; “जो कोई अपना हाथ हल पर रखकर पीछे देखता है, वह परमेश्वर के राज्य के योग्य नहीं।”
Jesus replied, “No one who puts his hand to the plow and looks back is fit for service in the kingdom of God.” --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
प्रस्तावना -
लूका रचित सुसमाचार के महान विषयों में से एक “यीशु का शिष्य बनने का मूल्य” है। यीशु की शिष्यता के लिए हमें अपना सब कुछ त्याग देना है अर्थात् हम सबों को आत्मत्याग, आत्मदमन, अनासक्ति के मानदंडों का पालन करना है। यीशु और उसकी शिक्षा के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रभु के रूप में उसके प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध होना शामिल है। जैसा कि यीशु ने कुछ लोगों को अपने विशिष्ट शिष्य बनाया,जो सब कुछ छोड़ कर उनके साथ रहने लगे। यीशु ने उनको प्रशिक्षण दिया और उनमें से 12 प्रेरितों को चुना। यीशु ने उन्हें अपने जीवन काल में फिलिस्तीन में और अपनी मृत्यु (पुनरूत्थान) के बाद समस्त संसार में सुसमाचार का प्रचार करने भेजा। [मत्ती10:2-8, मर16:14-15]
यीशु मसीह अपने मिशन को पूरा करने के लिये यरुशलेम की यात्रा पर जा रहे थे। मार्ग में यीशु के साथ-साथ उनके शिष्य भी यात्रा कर रहे थे, जो यीशु के साथ उसके मिशन में जाना चाहते थे। संत लूका ने ऐसे 03 लोगों का परिचय दिया जो यीशु की यरुशलेम यात्रा में उसके साथ जाना चाहते थे।
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[1] व्यक्तिगत व्यवहार [आरामदेह] का मूल्य – The Cost of Personal Comport [लूका 9:57-58] -
किसी ने अर्थात् शास्त्री [मत्ती8:19] अर्थात् वह जो पवित्रशास्त्र लिखने में दक्ष हो। इन्हें मूसा की व्यवस्था का शिक्षक भी माना जाता था। ये शास्त्री यहूदी धर्मशास्त्रों और व्यवस्था की व्याख्या कर उसे समझाते थे ताकि लोगों को कैसा जीवन जीना चाहिए,इस बात को समझने में उन्हें सहायता मिल सके।
किसी ने अर्थात् शास्त्री ने तत्काल यह दावा किया कि “जहां जहां तू जाएगा, मैं तेरे पीछे हो लूंगा।” जो उसने एक सराहनीय इच्छा को प्रगट किया। अन्य लोगों के विपरीत, यह शास्त्री तत्काल यीशु के पीछे चलने लिये कोई आपत्ति व्यक्त नहीं किया बल्कि वह साहसपूर्ण घोषणा करता है कि वह हर जगह यीशु का अनुसरण करेगा।
यीशु, शास्त्री को जवाब देते हुए कहता है, “लोमडिय़ों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं, पर मनुष्य के पुत्र को सिर धरने की भी जगह नहीं।” इस गम्भीर चिन्तन के विषय में यीशु का प्रत्युत्तर था कि जो व्यक्ति उसके पीछे चलना चाहता है उसे उन बातों को छोड़ना है जिन्हें वे अपनी आवश्यकताएं समझते हैं। यीशु, अनुयायियों के साथ अपने मिशन को पूरा करने येरुशलेम के मार्ग पर थे। जहां पर मनुष्य के पुत्र - यीशु और उनके अनुयायियों के रहने के लिए अपना कोई घर नहीं होगा। जहां वह बहुत दुःख उठाएगा, और पुरिनए और महायाजक और शास्त्री के द्वारा उसे तुच्छ समझकर मार डाला जाएगा, और वह तीसरे दिन जी उठेगा। (लूका 9:22)।
यीशु जो बात कह रहा है वह यह दिखाना है कि यीशु का अनुसरण करना आसान नहीं है। आप अपना सुख, चैन, नींद, आरामदायक जीवन को खो सकते हैं। यीशु का अनुसरण करना बहुत कठिन हो सकता है और आप सबों को बहुत से परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा विभिन्न विषम परिस्थितियों से भी गुजरकर जाना पड़़ सकता है। यदि यीशु की शिष्यता को ग्रहण करते हैं तो यीशु मसीह का यह प्रतीज्ञा है कि आपका परमेश्वर से मेल हो जाएगा।
यूहन्ना 10:27-28- [27]मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं, और मैं उन्हें जानता हूं, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं। [28]और मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूं, और वे कभी नाश न होंगी, और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न लेगा।
मत्ती 4:19 – और उन से कहा, मेरे पीछे चले आओ, तो मैं तुम को मनुष्यों के पकड़ने वाले बनाऊंगा।
लूका 9:23 – उस ने सब से कहा, यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप से इन्कार करे और प्रति दिन अपना क्रूस उठाए हुए मेरे पीछे हो ले।
लूका 9:51 – जब उसके ऊपर उठाए जाने के दिन पूरे होने पर थे, जो उस ने यरूशलेम को जाने का विचार दृढ़ किया।
लूका 14:33 – इसी रीति से तुम में से जो कोई अपना सब कुछ त्याग न दे, तो वह मेरा चेला नहीं हो सकता।
मनुष्य के पुत्र [लूका 9:58] –
“परमेश्वर का पुत्र” पदनाम यीशु का ईश्वरीय नाम है (मत्ती8:29), “दाऊद का पुत्र” उनका यहूदी नाम (मत्ती 9:27), परन्तु “मनुष्य का पुत्र” वह नाम है जो उन्हें इस संसार से और उसके कार्य से संबंधित है। यह उनका स्वयं के लिए प्रिय पदनाम था (80 से भी अधिक बार प्रयोग) और दानिय्येल 7:13-14 पर आधारित था। यह
(1) उसकी दीनता और मानवता (मत्ती 8:20),
(2) उसके दुःख और मृत्यु (लूका19:10), और
(3) राजा के रूप में उसके भविष्य के शासन (मत्ती 24:27)
के महत्व को दर्शाता है।
मत्ती 8:20 - यीशु ने उस से कहा, लोमडिय़ों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं; परन्तु मनुष्य के पुत्र के लिये सिर धरने की भी जगह नहीं है।
जब यीशु स्वयं अपने आपको मनुष्य का पुत्र कहता है तो वह इस सच्चाई की ओर ध्यान दिलाना चाहता है कि वह एक मनुष्य है।
यहूदी धर्मशास्त्रों (पुराना नियम) के अनुसार “मनुष्य का पुत्र” का अर्थ एक सामान्य मनुष्य से है। यह बात यहेजकेल की पुस्तक में स्पष्ट हो जाती है जहां प्रभु यहोवा के नबी को लगभग 100 बार “मनुष्य का पुत्र” कहा गया है।
दानिय्येल नबी भी इसी अभिव्यक्ति का कुछ अलग प्रकार से प्रयोग करता है। वह कहता है कि उसने देखा कि “मनुष्य के सन्तान-सा” कोई आकाश के बादलों समेत आ रहा था ”(दानि.7:13)। यहां “मनुष्य के सन्तान-सा” अभिव्यक्ति एक मुक्तिदाता की ओर संकेत है- एक व्यक्ति जिसे परमेश्वर संसार और उसके लोगों पर राज्य करने के लिये चुनेगा। इसी “मनुष्य के पुत्र” के समान यीशु, परमेश्वर के चुने हुए (मसीह) के रूप में आता है।
सुसमाचारों में भी यीशु अपने लिये “मनुष्य का पुत्र” नाम का प्रयोग करता है। कभी वह अपनी मानवता को प्रगट करने के लिये (मत्ती 8:20) या कभी अपनी उस भूमिका पर बल देने के लिये कि वह पापों की क्षमा के लिये दु:ख उठाएगा और मारा जाएगा - इसी अभिव्यक्ति का प्रयोग करता है (मर.8:31,9:31,10:45)। परन्तु यह अभिव्यक्ति प्रभु यीशु की भावी महिमा को दर्शाने के लिये प्रयुक्त हुई है, जब परमेश्वर के जनों को एकत्रित किया जाएगा और परमेश्वर का राज् स्थापित होगा (मर.8:38-9: 1) । लोग मनुष्य के पुत्र को सर्वशक्तिमान परमेश्वर की दाहिनी ओर विराजमान देखेंगे (मर.14:42)। उसे बड़ी सामर्थ्य और अधिकार के साथ पृथ्वी पर लौट कर आते हुए देखा जाएगा (मत्ती24:30)।
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[2] व्यक्तिगत सुरक्षा का मूल्य – The Cost of Personal Security [लूका 9:59-60] -
“हे प्रभु, मुझे पहिले जाने दे कि अपने पिता को गाड़ दूं [लूका 9:59] –
यरुशलेम की यात्रा पर यीशु ने दूसरे मनुष्य से कहा, “मेरे पीछे हो ले।”;उस मनुष्य ने यह उत्तर दिया कि “हे प्रभु, मुझे पहिले जाने दे कि अपने पिता को गाड़ दूं।”
इस वचन में हम देखते हैं कि दूसरे मनुष्य ने यीशु के आव्हान - “मेरे पीछे हो ले” के प्रत्युत्तर में आग्रह करता है कि पहले अपने पिता को गाड़ने के लिए जाने दे। जैसा कि दूसरे मनुष्य का कथन है - “हे प्रभु, मुझे पहिले जाने दे कि अपने पिता को गाड़ दूं।” इस वचन पर ध्यान दें तो पायेंगे कि - (i) यदि उस मनुष्य का पिता, वास्तव में, मर गया होता तो वह मनुष्य यीशु के यरुशलेम की यात्रा में उसके साथ नहीं होता और अपने पिता का अन्तिम संस्कार कर रहा होता।
(ii) यदि उस मनुष्य का पिता किसी गम्भीर बीमारी की दशा में होता तो भी वह मनुष्य यीशु के साथ यरुशलेम की यात्रा में नहीं होता बल्कि वह अपने पिता का देखभाल कर रहा होता।
(iii) यदि उस मनुष्य का पिता मरने मरने की स्थिति में होता तो भी वह मनुष्य अपने पिता का सेवा-शुश्रूषा व इलाज करा रहा होता और वह मनुष्य यीशु के साथ यरुशलेम की यात्रा में नहीं होता। यदि वास्तव में उस मनुष्य का पिता मरणासन्न अवस्था में होता तो उसका यह निवेदन कि यीशु का अनुकरण करने से पहले उसे कुछ समय दिया जाए। कदाचित वह मनुष्य अपने पिता का उत्तराधिकारी व वारिस होने के नाते सम्पत्ति में से मीरास को भी प्राप्त करना चाहता था।
इन तीनों ही स्थितियों से स्पष्ट है कि उसके पिता की मृत्यु नहीं हुई थी; उसका आशय यह था कि उसके पिता की मृत्यु तक वह उसकी देखभाल करने का दायित्व पूरा करना चाहता था।
मत्ती 8:22 - यीशु ने उस से कहा, तू मेरे पीछे हो ले; और मुरदों को अपने मुरदे गाड़ने दे॥
मुरदों को अपने मुर्दे गाड़ने दे [लूका 9:60] –
“मुरदों को अपने मुर्दे गाड़ने दे”—यह एक लोकप्रिय कहावत थी जिसका अर्थ था – अतीत की चीजों को छोड़ दो, जो हुआ उसके लिए समय मत गंवाओं और भविष्य का ध्यान करो। यीशु में नये जीवन की खोज करने के बाद, शिष्य को अतीत में जो हुआ है – उस पर समय बर्बाद नहीं करना चाहिए।
यीशु का प्रत्युत्तर कि “मुरदों को अपने मुर्दे गाड़ने दे”, इसका यह आशय है कि आत्मिक रूप से मृतक, शारीरिक रूप से मृतकों को दफन कर सकते हैं अर्थात्, जो आत्मिक रीति से मृतक हैं वे शारीरिक मृतकों को गाड़े। वास्तव में बात यह थी कि परमेश्वर के राज्य का प्रचार करना इतना महत्वपूर्ण था कि इसमें विलंब नहीं किया जा सकता था। यदि वह मनुष्य सब कुछ छोड़कर यीशु का अनुयायी बन जाता तो अवश्य ही समाज में निन्दा होती। किन्तु यह निन्दा इतना महत्वपूर्ण नहीं था जितना कि परमेश्वर के राज्य का प्रचार करने और यीशु के पीछे हो लेने का महत्व था। यीशु के शिष्यता के प्रति एक शिष्य को पूर्ण समर्पण करना अनिवार्य है क्योंकि परमेश्वर के राज्य की बुलाहट ही सर्वोपरि है।
यीशु ने मत्ती चुंगी लेने वाले से यही वचन अर्थात् “मेरे पीछे हो ले” कहकर बुलाया कि वह उसका अनुसरण करें तब मत्ती ने सब-कुछ छोड़कर यीशु के पीछे हो लिया (लूका 5:27-28)।
मत्ती 4:23 - और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उनकी सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बलता को दूर करता रहा।
यहूदियों के लिए उनके मृतकों का उचित रूप से दफ़नाया जाना बहुत महत्वपूर्ण दायित्व रहा है। यहां पर यीशु सम्भवतः यह स्पष्ट करना चाह रहा है कि उसके पीछे चलना उचित दफ़न-क्रिया से भी अधिक महत्वपूर्ण है।
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“दफ़न-क्रिया”- इस्राएल और प्राचीन पश्चिमी एशिया के देशों में मृतकों को उचित सम्मान के साथ दफ़नाया जाना माना जाता था। पलस्तीन के गर्म वातावरण के कारण यह बहुत आवश्यक था कि मृत व्यक्ति को 24 घंटों के भीतर ही दफ़ना दिया जाए। वास्तव में यहूदी कानून के अनुसार मृत व्यक्ति को सूर्य डूबने से पहले दफ़नाना होता था (व्य.21:23)। अपने किसी प्रिय जन के शव को बिना दफ़नाये भूमि पर छोड़ देना जहां गिद्ध और कुत्ते शव खाएं, एक घोर अपमान की बात मानी जाती थी।
बाइबल में ऐसा पूर्ण विवरण कहीं नहीं पाया जाता जहां यह बताया गया हो कि यहूदी किस प्रकार शरीर को दफनाने के लिए तैयार करते थे । फिर भी,यह जानकारी तो है कि शरीर धोया जाता था (प्रेरि.9:37), सुगन्धित लेप मला जाता था (लूका24:1), तथा कपड़े में लपेटा जाता था (मत्ती 27:59,यूह.11:44)।
अधिकतर प्राचीन इब्रानी लोग गुफाओं या भूमि में खाई खोदकर दफ़नाए गए थे। सारा और अब्राहम को मकपेला की गुफ़ा, जो हेब्रोन के समीप है, में दफ़नाया गया था (उत्प.23:19,25:9,10)। बाद में, चट्टानों में क़ब्रें काटकर बनाई जाती थी। कुछ कब्रों में एक ही शरीर रखा जा सकता था, तथा अन्यों में कई शरीर रखें जा सकते थे और इन्हें परिवारों द्वारा प्रयोग किया जाता था। चूंकि शव को छूने से, अनजाने में ही सही, व्यक्ति यहूदी नियमों के अनुसार अनुष्ठानिक रूप में अशुद्ध ठहरता था, अतः क़ब्रों पर स्पष्ट चिन्ह लगाए जाते थे। जब मांस क़ब्र में ही सड़ जाता था, तब हड्डियों को एक सन्दुक (इसे अस्थिपात्र कहा जाता था) में एकत्रित कर लिया जाता था। तब उस समतल जगह को, जहां पहले मृतक शरीर था, किसी दूसरे मरने वाले के लिए पुनः प्रयोग किया जा सकता था।
यूनानी, रोमी तथा कनानी लोग मरने वालों को प्रायः जला (शव-दहन) देते थे । यहूदी इसे अपमान समझते थे तथा ऐसा तभी करते थे जब शरीर पहले ही से सड़ने की दशा में पहुंच चुका हो (1शमु.31:12), या महामारी की स्थिति में वे ऐसा करते थे (आमो.6:10)। जो लोग परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करते थे, उनके शरीरों को भी कभी कभी जला दिया जाता था (लैव्य.20:40,यहो.7:25)।
दफ़न-क्रिया परिवार के सदस्यों द्वारा मृत व्यक्ति के लिए विलाप करना (लूका7:12) तथा शरीर को दफनाने के लिए क़ब्रिस्तान ले जाने तक सीमित होती थी। मृत व्यक्ति को लकड़ी के चौखट पर रखकर दफ़नाने की जगह ले जाया जाता था (2शमू.3:31,लूका7:11-15)। दफनाने के बाद वे लोग जिन्होंने शरीर को छुआ है, अशुद्ध माने जाते थे और उन्हें फिर से समाज में भागी होने के लिए शुध्दिकरण की रीति-विधि को पूरा करना पड़ता था (गिन.19:11-20)। इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता कि यीशु के दिनों में यहूदी लोग मृत व्यक्ति के सम्मान में प्रार्थना सभाओं का आयोजन करते थे।
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[3] व्यक्तिगत पारिवारिक रिश्तों का मूल्य – The Cost of Personal Relationships [लूका9:61-62] –
पहले मुझे जाने दे कि अपने घर के लोगों से विदा हो आऊं [लूका 9:61] –
तीसरा मनुष्य केवल घर जाकर अपने परिवार जनों को अलविदा या विदाई का नमस्कार कहना चाहता था। जब एलीशा हल जोत रहा था तब एलिय्याह ने एलीशा को अपनी चादर डाल दिया था। उस समय एलिय्याह से एलीशा ने भी अपने माता-पिता से विदा लेने की अनुमति का मांग किया गया था।
यीशु के वचन इस बात पर बल देते है कि परमेश्वर के राज्य का उसका संदेश किसी भी और बात से – परिवार जनों से भी अधिक महत्वपूर्ण था। इसके लिए न परमेश्वर के राज्य का प्रचार को रोका जा सकता है और न ही मसीहा (यीशु मसीह) उनका प्रतीक्षा कर सकते हैं। यीशु का संदेश एलिय्याह के संदेश से कहीं अधिक था और पूर्ण निष्ठा की मांग करता था।
जो कोई अपना हाथ हल पर रखकर पीछे देखता है [लूका 9:62] –
ऐसा करने से हल रेखा टेढ़ी हो जाएगी।
यीशु के अनुयायियों की रूचियां विभाजित नहीं होना चाहिए जैसा कि एक किसान हल चलाना आरम्भ करके पीछे देखे तो हर की टेढ़ी-मेढ़ी हो जाएगी।
चूंकि यीशु अपने मिशन को पूरा करने के लिए यरूशलेम के मार्ग पर था, अपितु उन मनुष्यों को उसी समय निर्णय लेना आवश्यक था कि वह क्या करने जा रहा था। रूचि की बात तो यह है कि संत लूका ने उन तीन मनुष्यों से यीशु की बातचीत के अन्तिम परिणाम नहीं लिखे हैं।
लूका 14:26 - यदि कोई मेरे पास आए, और अपने पिता और माता और पत्नी और लड़के बालों और भाइयों और बहिनों बरन अपने प्राण को भी अप्रिय न जाने, तो वह मेरा चेला नहीं हो सकता।
मत्ती 10:37 - जो माता या पिता को मुझ से अधिक प्रिय जानता है, वह मेरे योग्य नहीं और जो बेटा या बेटी को मुझ से अधिक प्रिय जानता है, वह मेरे योग्य नहीं।
1 राजा 19:19-21 -
[19]तब वह वहां से चल दिया, और शापात का पुत्र एलीशा उसे मिला जो बारह जोड़ी बैल अपने आगे किए हुए आप बारहवीं के साथ हो कर हल जोत रहा था। उसके पास जा कर एलिय्याह ने अपनी चद्दर उस पर डाल दी।
[20]तब वह बैलों को छोड़ कर एलिय्याह के पीछे दौड़ा, और कहने लगा, मुझे अपने माता-पिता को चूमने दे, तब मैं तेरे पीछे चलूंगा। उसने कहा, लौट जा, मैं ने तुझ से क्या किया है?
[21]तब वह उसके पीछे से लौट गया, और एक जोड़ी बैल ले कर बलि किए, और बैलों का सामान जलाकर उनका मांस पका के अपने लोगों को दे दिया, और उन्होंने खाया; तब वह कमर बान्धकर एलिय्याह के पीछे चला, और उसकी सेवा टहल करने लगा।
फिलिप्पियों 3:13 - हे भाइयों, मेरी भावना यह नहीं कि मैं पकड़ चुका हूं: परन्तु केवल यह एक काम करता हूं, कि जो बातें पीछे रह गई हैं उन को भूल कर, आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ।
लूका 9:23 में यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, “ यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप का इन्कार करे, और प्रतिदिन अपना क्रूस उठाए हुए मेरे पीछे हो ले। “
लूका 9:57-62 के वचन में यीशु की बुलाहट का शीर्षक “मेरे पीछे हो ले” से हम मसीही विश्वासियों को 03 मुख्य शिक्षा मिलती है –
1. पहला, हमें यह जानना है कि यीशु के पीछे हो लेना, हमारे जीवन की सांसारिक सुख-समृद्धि और एशो-आराम से बढ़कर है। अतः हम भौतिक वस्तुओं को त्याग दें यानि कि हम भौतिक असुविधाओं को सहने के लिये सदैव तैयार रहें और यीशु का अनुसरण करें।
2. दूसरा, हमें यह जानना है कि यीशु के पीछे हो लेना, हमारे परिवार व अन्य सभी उत्तरदायित्वों से बढ़कर है। अतः हम परिवार के बंधनों से नाता तोड़ दें तथा हम यीशु के सम्मुख अपने अन्य सभी उत्तरदायित्वों को दूसरी श्रेणी मे रखें और यीशु का अनुसरण करें।
3.तीसरा, हमें यह जानना है कि यीशु के पीछे हो लेना, हमारे दैनिक आवश्यकताओं एवं मीरास प्राप्ति की हर दूसरी इच्छा से बढ़कर है। हमारे जीवन में अपने हर एक इच्छा से बढ़कर प्रभु यीशु को सर्वोच्च प्राथमिकता देना है। अतः हम यीशु के प्रति पूर्ण समर्पण करें और यीशु मसीह का अनुसरण करें ।
हमें अतीत की चीजों से जुड़ाव नहीं रखना है और एक नये तरीके से अपने जीवन में सब कुछ यथा - भौतिक वस्तुओं, व्यक्तिगत जीवन और पारिवारिक जीवन को एकीकृत करना है।
आइए, हम आत्मत्याग के मार्ग पर चलें, जिससे हम यीशु के शिष्य बन सकें और सारे मन से, सारे हृदय से और पूर्ण समर्पण से यीशु के पीछे हो लें कि हम परमेश्वर के राज्य का सहभागी बन सकें।
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