👉 बातचीत--"अश्लील नहीं, बल्कि मनोहर हो"
1. आपके मुख से कोई अश्लील बात नहीं, बल्कि ऐसे शब्द निकले, जो अवसर के अनुरूप दूसरों के निर्माण तथा कल्याण में सहायक हो।
[कोई गन्दी बात तुम्हारे मुंह से न निकले, पर आवश्यकता के अनुसार वही जो उन्नति के लिये उत्तम हो, ताकि उससे सुनने वालों पर अनुग्रह हो।]
-----Ephesians 4:29.
2.जैसा कि सन्तों के लिये उचित है, आप लोगों के बीच किसी प्रकार के व्यभिचार और अशुध्दता अथवा लोभ की चर्चा तक न हो, और न भद्दी, मूर्खतापूर्ण या अश्लील बातचीत; क्योंकि यह अशोभनीय है -- बल्कि आप ईश्वर को धन्यवाद दिया करें।
[[3]और जैसा पवित्र लोगों के योग्य है, वैसा तुम में व्यभिचार, और किसी प्रकार अशुद्ध काम, या लोभ की चर्चा तक न हो।
[4]और न निर्लज्ज़ता, न मूढ़ता की बातचीत की, न ठट्ठे की, क्योंकि ये बातें सोहती नहीं, वरन् धन्यवाद ही सुना जाएं।]
----Ephesians 5:3-4.
3.अब तो आप लोगों को क्रोध, उत्तेजना, द्वेष, परनिन्दा और अश्लील बातचीत सर्वथा छोड़ देनी चाहिए।
[पर अब तुम भी इन सब को अर्थात् क्रोध, रोष, बैरभाव, निन्दा, और मुंह से गालियां बकना ये सब बातें छोड़ दो।]
---Colossians 3:8
4.आपकी बातचीत सदा मनोहर और सुरुचि-पूर्ण हो और आप लोग प्रत्येक को समुचित उत्तर देना सीखें।
[तुम्हारा वचन सदा अनुग्रह सहित और सलोना हो, कि तुम्हें हर मनुष्य को उचित रीति से उत्तर देना आ जाए।]
---Colossians 4:6.
5.लौकिक और व्यर्थ बकवाद से दूर रहो।जो लोग उसमें लगे रहते हैं वे धर्म के मार्ग से और भटकेंगे।
[पर अशुद्ध बकवाद से बचा रह; क्योंकि ऐसे लोग और भी अभक्ति में बढ़ते जाएंगे।]
---2Timothy 2:16.
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