|| यीशु ने कहा, "देखो, मैं शीघ्र आनेवाला हूँ। मेरा पुरस्कार मेरे पास है और मैं प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्मों का प्रतिफल दूँगा। मैं अल्फा और ओमेगा; प्रथम और अन्तिम; आदि और अन्त हूँ।" Revelation 22:12-13     
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विभिन्न परिस्थितियों के लिये प्रार्थना

1

चिंता के समय शान्ति---- 
6 किसी भी बात की चिंता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किये जाएँ ।
7 तब परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे है, तुम्हारे हदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी । Philippians 4:6-7.

2

भय के समय साहस --- 
5 तुम्हारा स्वभाव लोभरहित हो,और जो तुम्हारे पास है उसी पर सन्तोष करो; क्योंकि उसने आप ही कहा है, " मैं तुझे कभी न छोडूंगा, और न कभी तुझे त्यागूंगा। 
6 इसलिए हम निडर होकर कहते हैं, " प्रभु मेरा सहायक है, मैं न डरुंगा; मनुष्य मेरा क्या कर सकता है । ---Hebrews 13:5-6.

3

क्लेश के समय सहायता --- 
8 इसके विषय में मैं ने प्रभु से 03 बार विनती की कि मुझ से यह दूर हो जाए। 
9 पर उसने मुझ से कहा, " मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है; क्योंकि मेरी सामर्थ्य निर्बलताओं में सिध्द होती है । " इसलिये मैं बड़े आनन्द से अपनी निर्बलताओं पर घमण्ड करुंगा कि मसीह की सामर्थ्य मुझ पर छाया करती रहे । 
10 इस कारण मैं मसीह के लिये निर्बलताओं में, और निन्दाओं में, और दरिद्रता में, और उपद्रवों में, और संकटों में प्रसन्न हूँ; क्योंकि जब मैं निर्बल होता हूँ, तभी बलवन्त होता हूँ । 2Corinthians 12:8-10.

4

निर्णय के समय मार्गदर्शन --- 
5 पर यदि तुम में से किसी को बुध्दि की घटी हो तो परमेश्वर से मांगे, जो बिना उलाहना दिए सबको उदारता से देता है, और उसको दी जाएगी । 
6 पर विश्वास से मांगे, और कुछ सन्देह न करे, क्योंकि सन्देह करनेवाला समुद्र की लहर के समान है जो हवा से बहती और उछलती है । 
7 ऐसा मनुष्य यह न समझे कि मुझे प्रभु से कुछ मिलेगा, 
8 वह व्यक्ति दुचिता है और अपनी सारी बातों में चंचल है । याकूब(James )1:5-8.
इसलिये आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बाँधकर चलें कि हम पर दया हो , और वह अनुग्रह पाएँ जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे। Hebrews 4:16.

5

थकान के समय विश्राम ---- 
28 " हे सब परिश्रम करनेवालों और बोझ से दबे हुए लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा । 
29 मेरा जुआ अपने ऊपर उठा लो,और मुझसे सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ : और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे । 
30 क्योंकि मेरा जुआ सहज और मेरा बोझ हलका है । Mathew 11:28-30.
31 सो हम इन बातों के विषय में क्या कहें? यदि परमेश्वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन हो सकता है? 
32 जिस ने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्तु उसे हम सब के लिये दे दिया: वह उसके साथ हमें और सब कुछ क्योंकर न देगा? 
33 परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा? परमेश्वर वह है जो उन को धर्मी ठहराने वाला है।
34 फिर कौन है जो दण्ड की आज्ञा देगा? मसीह वह है जो मर गया वरन मुर्दों में से जी भी उठा, और परमेश्वर की दाहिनी ओर है, और हमारे लिये निवेदन भी करता है। 
35 कौन हम को मसीह के प्रेम से अलग करेगा? क्या क्लेश, या संकट, या उपद्रव, या अकाल, या नंगाई, या जोखिम, या तलवार? 
36 जैसा लिखा है, कि तेरे लिये हम दिन भर घात किए जाते हैं; हम वध होने वाली भेंडों की नाईं गिने गए हैं। 
37 परन्तु इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिस ने हम से प्रेम किया है, जयवन्त से भी बढ़कर हैं। 
38 क्योंकि मैं निश्चय जानता हूं, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएं, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ, न ऊंचाई, 
39 न गहिराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी। Romans 8 : 31-39.

6

दु:ख के समय सांत्वना ---- 
3 हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद हो, जो दया का पिता और सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर है । 
4 वह हमारे सब क्लेश में शान्ति देता है ; ताकि हम उस शान्ति के कारण जो परमेश्वर हमें देता है, उन्हें भी शान्ति दे सकें जो किसी प्रकार के क्लेश में हों। 
5 क्योंकि जैसे मसीह के दु:खों में हम अधिक सहभागी होते हैं, वैसे ही हम शान्ति में भी मसीह के द्वारा अधिक सहभागी होते हैं । 2Corinthians 1:3-5.
26 इसी रीति से आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है : क्योंकि हम नहीं जानते कि प्रार्थना किस रीति से करना चाहिए, परन्तु आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर, जो बयान से बाहर हैं, हमारे लिये विनती करता है; 
27 और मनो का जाँचने वाला जानता है कि आत्मा की मनसा क्या है? क्योंकि वह पवित्र लोगों के लिये परमेश्वर की इच्छा के अनुसार विनती करता है । 
28 हम जानते हैं कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है; अर्थात उन्हीं के लिये जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं । Romans 8: 26-28.

7

परीक्षा के समय शक्ति --- 
12 धन्य है वह मनुष्य जो परीक्षा में स्थिर रहता है, क्योंकि वह खरा निकलकर जीवन का वह मुकुट पाएगा जिसकी प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने प्रेम करनेवालों से की है । 
13 जब किसी की परीक्षा हो, तो वह यह न कहे कि मेरी परीक्षा परमेश्वर की ओर से होती है; क्योंकि न तो बुरी बातों से परमेश्वर की परीक्षा हो सकती है, और न वह किसी की परीक्षा आप करता है । 
14 परन्तु प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही अभिलाषा से खिंचकर और फंसकर परीक्षा में पड़ता है । 
15 फिर अभिलाषा गर्भवती होकर पाप को जनती है और पाप जब बढ़ जाता है तो मृत्यु को उत्पन्न करता है । 
16 हे मेरे प्रिय भाईयो, धोखा न खाओ । याकूब (James )1: 12-16.
6 ये बातें हमारे लिये दृष्टान्त ठहरी, कि जैसे उन्होंने लालच किया, वैसे हम बुरी वस्तुओं का लालच न करें। 
7 और न तुम मूरत पूजने वाले बनों; जैसे कि उन में से कितने बन गए थे, जैसा लिखा है, कि लोग खाने-पीने बैठे, और खेलने-कूदने उठे। 
8 और न हम व्यभिचार करें; जैसा उन में से कितनों ने किया: एक दिन में तेईस हजार मर गये । 
9 और न हम प्रभु को परखें; जैसा उन में से कितनों ने किया, और सांपों के द्वारा नाश किए गए। 
10 और न तुम कुड़कुड़ाएं, जिस रीति से उन में से कितने कुड़कुड़ाए, और नाश करने वाले के द्वारा नाश किए गए। 
11 परन्तु यें सब बातें, जो उन पर पड़ी, दृष्टान्त की रीति पर भी: और वे हमारी चितावनी के लिये जो जगत के अन्तिम समय में रहते हैं लिखी गईं हैं। 
12 इसलिये जो समझता है, कि मैं स्थिर हूं, वह चौकस रहे; कि कहीं गिर न पड़े। 
13 तुम किसी ऐसी परीक्षा में नहीं पड़े, जो मनुष्य के सहने से बाहर है: और परमेश्वर सच्चा है: वह तुम्हें सामर्थ से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन परीक्षा के साथ निकास भी करेगा; कि तुम सह सको। 1Corinthians 10:6-13.

8

क्षमा प्राप्ति के समय आनन्द ----- 
7 पर यदि जैसा वह ज्योति में है, वैसे ही हम भी ज्योति में चलें, तो एक दूसरे से सहभागिता रखते हैं, और उसके पुत्र यीशु का लहू हमें सब पापों से शुध्द करता है । 
8 यदि हम कहें कि हम में कुछ भी पाप नही, तो अपने आप को धोखा देते हैं, और हम में सत्य नहीं । 
9 यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुध्द करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है । 
10 यदि हम कहें कि हम ने पाप नही किया , तो उसे झूठा ठहराते हैं, और उसका वचन हम में नहीं है । 1John 1: 7-10.

9

उध्दार का मार्ग --- 
यीशु ने उसको उत्तर दिया,मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्में तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता ।" --- John 3:3. 
क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नष्ट न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए । 
--- John 3:16. 
परन्तु जो धार्मिकता विश्वास से है, वह यों कहती है, "तू अपने मन में यह न कहना कि स्वर्ग पर कौन चढ़ेगा? "(अर्थात मसीह को उतार लाने के लिये! ) ----Romans 10:6.

10

धन्यवाद के समय स्तुति ---- 
हर बात में धन्यवाद करो; क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है । 1Thessalonians 5:18.
इसलिये हम उसके द्वारा स्तुतिरुपी बलिदान, अर्थात उन होठों का फल जो उसके नाम का अंगीकार करते हैं, परमेश्वर को सर्वदा चढ़ाया करें । Hebrews 13: 15.

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